BASTI : "हर्रैया नगर पंचायत" राजस्व अभिलेखों में आज भी गांव ?

Sudhanshu Mishra
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"हर्रैया नगर पंचायत" राजस्व

 अभिलेखों में आज भी गांव ? 



- भ्रष्ट अफसर बने भू माफियाओं के मोहरे !


- बखरा मिला तो, रिटायर भागीदार को बना डाला फर्म में आधे का हिस्सेदार !


(अशोक मिश्र )
बस्ती (टाइम्स ऑफ बस्ती)। करीब तीन दशक पहले कई गांवों को जोड़कर बनी नगर पंचायत हर्रैया आज भी कागज़ों में गांव ही दर्ज है। हालत ये है कि सघन आबादी को भी राजस्व अभिलेखों में ‘आबादी’ का दर्जा नहीं मिला है। नतीजा—तहसील मुकदमों के अनावश्यक बोझ तले दबी हुई है, असली मामलों पर सुनवाई पिछड़ रही है, और घूसखोर अफसरों की मिलीभगत से जालसाज, जमीनों को विवादित बनाकर उन्हें हड़पने का शातिराना खेल खेल रहे हैं।
          
            आइये एक घटनाक्रम से समझते हैं कि, राजस्व अभिलेखों की इन कमियों का फायदा जालसाज जमीनों को विवादित बनाकर ब्लैकमेल करने, उसकी नवइयत बदलकर उसे हड़पने में आखिर कैसे करते हैं ?
   
               सन 2016 में हर्रैया नगर पंचायत के सम्राट नगर (अब अम्बेडकर नगर) निवासी पत्रकार श्रीश द्विवेदी ने उप जिलाधिकारी हर्रैया के न्यायालय में धारा 144 का एक वाद दाखिल किया। जिसमे मुंसिफ बस्ती के न्यायालय की 1992 की एक डिग्री लगाकर यह याचना की गई कि, भूमि गाटा संख्या 204 एक रजिस्टर्ड पार्टनरशिप फर्म, मेसर्स श्री राधा हस्तकरघा उद्योग की संपत्ति है। और संलग्न डिग्री के मुताबिक इस फर्म के कुल चार भागीदारों में से तीन भागीदार रिटायर होकर इसकी समस्त जिम्मेदारी और संपत्ति से मुक्त हो चुके हैं। केवल वादी ही इसके एक मात्र स्वामी शेष बचे हैं। लिहाजा इस नम्बर के अभिलेखों में दर्ज रिटायर हो चुके तीनों भागीदारों का नाम हटाकर केवल श्रीश को इस नम्बर का तनहा भूस्वामी घोषित किया जाय।
        
               गौरतलब है कि, राजस्व न्यायालय के पास इस डिग्री का अनुपालन करते हुए श्रीश को इस नम्बर का तनहा भूस्वामी घोषित करने के अलावा उस स्थिति में कोई विधिक बाधा कानून के जानकारों के मुताबिक ना तो थी और ना ही आज है जबकि, कोई ऐसा दूसरा आदेश विपक्षियों की ओर से नहीं प्रस्तुत किया गया है, जो मुंसिफ के आदेश को चुनौती दे सके। लेकिन ...

                 लेकिन राजस्व अभिलेखों में उद्योग की यह जमीन गांव की एक सामान्य जमीन ही दर्ज है। और नगर पंचायत के अम्बेडकर नगर वार्ड का यह नगरीय आबादी क्षेत्र अपने वास्तविक रूप में नहीं बल्कि, एक गांव, "राजघाट" के रूप में ही तीन दशक बाद आज भी दर्ज है। अब आते हैं मुद्दे पर कि, अभिलेखों की इस खामी को जालसाजों ने घूसखोर अफसरों से मिलकर आख़िर कैसे भुनाया ?

                 दरअसल 1992 में इस फर्म से रिटायर हो चुके भागीदारों की नीयत 2017 आते आते खराब हो गई। और पराई संपत्ति हड़पने की हवस इनपर इस तरह हाबी हुई कि, इन्हें अपना रिटायरमेंट, मुंसिफ की डिग्री और जमीन का मुकदमे में विचाराधीन होना वगैरा सबकुछ दिखाई देना बन्द हो गया। ऐसे में रिटायर भागीदार रवीश चन्द्र ने तथ्यों को छिपाकर 2017 में ही इसी जमीन पर इसी न्यायालय में बंटवारा दाखिल कर दिया। जो आगे चलकर खारिज हुआ। ऐसा इसने दो बार किया और तीसरी बार की तैयारी कर रहा है। अपने बंटवारे के इस मुकदमे में रवीश ने यह उल्लेख कहीं नहीं किया कि, यह पार्टनरशिप फर्म की जमीन है। और यह किसी गांव की जमीन नहीं, बल्कि नगरीय आबादी क्षेत्र है। यहां इसे राजस्व अभिलेखों की त्रुटि ही जमीन हड़पने का औजार नज़र आई। जिसके दम पर ही इस जमीन के बंटवारे का मुकद्दमा तहसील के राजस्व न्यायालय में चलता रहा।

                  इतना ही नहीं, इससे एक कदम आगे बढ़कर दूसरे रिटायर भागीदार प्रवीश चन्द्र ने भी इस जमीन को हड़पने के लिए विचाराधीन स्थिति में ही खतौनी में दर्ज अपने और रिटायर माया देवी के नाम का लाभ उठाया। और इस जमीन को अभिलेखों के आधार पर सामान्य तथा माया देवी का इसमें चौथा हिस्सा दिखाते हुए उस हिस्से का अपने हक में ना सिर्फ हिब्बा करा लिया बल्कि, अधिकारियों को बखरा देकर खारिज दाखिल भी करा लिया। यहां ध्यान देने वाली बात यह रही कि, यह सब गैरकानूनी काम करते हुए इसने एसडीएम हर्रैया, उनकी अदालत और उसमें विचाराधीन इस जमीन के मुकदमे की नाम मात्र भी हैसियत नहीं समझी। और इस मुकदमे के समानांतर इसी अदालत में बंटवारे का एक और मुकदमा भी ना सिर्फ दाखिल कर दिया बल्कि, इसमें एक पक्षीय आदेश कराकर प्राइमरी डिग्री भी हासिल कर ली। 

                     मतलब यह कि, एसडीएम हर्रैया की जो अदालत 2016 से आज तक मुंसिफ के आदेश के बावजूद इस जमीन की उद्घोषणा तक नहीं कर पाई है, उसी की समानांतर अदालत ने इस जालसाज को कागजों में इस फर्म में आधे का हिस्सेदार तक बनाकर बैठा चुकी है।

            अब यह सब कैसे सम्भव हुआ ? यह कोई छिपी बात नहीं। आज भी इस तहसील पर तमाम ऐसे "बहादुर" अधिकारी बैठे हुए हैं जो बखरा मिल जाने पर अपने अधिकार क्षेत्र से छलांग मारकर जमीनों की हेराफेरी में मददगार बनने से नहीं चूकते। राजस्व अभिलेखों की कमियों और बिना दाम के उनका सुधार करने में इन्हें कोई दिलचस्पी नहीं होती। क्योंकि, इसी से इनकी दाल रोटी चलती है।




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