आज भारत सहित पूरा विश्व अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, किन्तु इनमें “जल संकट” एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जो मानव जीवन के अस्तित्व से सीधे जुड़ा हुआ है। जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जिस धरती पर नदियाँ कल-कल बहती थीं, तालाब और कुएँ जीवन का सहारा थे, आज वहीं जल की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष बढ़ता जा रहा है। यदि समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
भारत में बढ़ती जनसंख्या, अंधाधुंध शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा जल के असंतुलित उपयोग ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। गाँवों में कुएँ सूख रहे हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई राज्यों में गर्मियों के समय लोगों को पीने के पानी के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। कहीं किसान फसलें सूखने के कारण परेशान हैं तो कहीं शहरों में पानी के टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
इस समस्या का एक बड़ा कारण मानव की लापरवाही भी है। हम जल को अनमोल मानने के बजाय उसका अपव्यय करते हैं। घरों में बहते नल, वर्षा जल का संरक्षण न करना, नदियों में कचरा और रसायन डालना ये सभी हमारी असावधानी के उदाहरण हैं। प्रकृति बार-बार हमें चेतावनी दे रही है, परंतु हम विकास की दौड़ में पर्यावरण संतुलन को भूलते जा रहे हैं।
जल संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी बन चुका है। जल की कमी से कृषि प्रभावित होती है, जिससे खाद्यान्न उत्पादन घटता है और महंगाई बढ़ती है। गरीब और ग्रामीण वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होता है। कई स्थानों पर पानी को लेकर विवाद और संघर्ष की घटनाएँ भी सामने आती हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो भविष्य में जल युद्ध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
इस संकट से बचने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर कार्य करना होगा। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाया जाए, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाए तथा जल संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए। विद्यालयों में बच्चों को जल बचाने की शिक्षा दी जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस जिम्मेदारी को समझ सकें। साथ ही, उद्योगों और कारखानों द्वारा जल प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण आवश्यक है।
अंतः, जल है तो कल है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के संसाधन असीमित नहीं हैं। यदि आज हमने जल संरक्षण का संकल्प नहीं लिया, तो आने वाला समय केवल प्यास और पश्चाताप लेकर आएगा। इसलिए प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह जल की हर बूंद का सम्मान करे और इस अमूल्य धरोहर को बचाने में अपना योगदान दे।
जल ही जीवन है
प्रतिमा पाठक
दिल्ली

