बस्ती। जिले की नगर पंचायत हर्रैया निवासी रिटायर्ड पशु चिकित्सक “प्रवीश” ने सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद शायद यह मान लिया था कि, "सरकारी नियम कायदों का डर अब खत्म हो चुका। लिहाजा भाई की संपत्ति हड़पने की राह भी अब आसान हो जाएगी।" लेकिन मौजूदा हालात ऐसे मोड़ पर पहुँचते दिखाई दे रहे हैं, जहाँ उसकी कथित चालें उसी पर भारी पड़ सकती हैं। न्यायालय में दिए गए उसके बयानों और सरकारी सेवा नियमावली के बीच दिखाई दे रहे विरोधाभास को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किए जाने की तैयारी पूरी कर ली गई है, जिससे उसकी मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गत 28 अप्रैल को शासन और प्रशासन स्तर पर कुल तीन शिकायती पत्र रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से भेजे गए थे, जो 04 मई को संबंधित कार्यालयों में प्राप्त भी हो चुके हैं। बताया गया कि, जून माह में हाईकोर्ट में अवकाश रहने के कारण जुलाई के प्रारम्भ में विधिक कार्यवाही शुरू कर दी जाएगी। इस बीच यदि 28 मई तक डॉक्टर प्रवीश के कथित कदाचारों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो एक रिमाइंडर भेजकर यह औपचारिकता भी पूरी कर दी जाएगी। ताकि, बाद में कोई यह न कह सके कि, संबंधित विभागों को कार्रवाई का अवसर नहीं दिया गया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि, आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। दो राज्य सरकारों के नियमों के साथ खिलवाड़ किया गया है। और यदि शासन-प्रशासन स्तर पर निष्पक्ष जांच हुई तो कई ऐसे तथ्य भी सामने आ सकते हैं, जो अब तक दबे हुए हैं। वहीं, यदि कार्रवाई में नरमी बरती गई तो न्यायालय के माध्यम से कार्रवाई सुनिश्चित कराने की तैयारी भी पूरी कर ली गई है। शिकायतकर्ता के अनुसार, “सरकारी नौकरी करते समय नियमों का लाभ लेना और बाद में उन्हीं नियमों की मनमाफिक व्याख्या करना, दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं।”
माना जा रहा है कि, यदि “उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956” केवल औपचारिक दस्तावेज़ नहीं है, तो आरोपों के अनुसार प्रवीश ने अपने पूरे सेवाकाल में नियम 03, 15 और 16 का गंभीर उल्लंघन किया है। जानकारों का कहना है कि ये नियम किसी सरकारी कर्मचारी की निष्पक्षता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं, न कि सुविधानुसार उनकी अलग अलग व्याख्या करने के लिए।
अदालती अभिलेखों के अनुसार, रिटायर्ड डॉक्टर प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी ने वर्ष 1992 से लेकर 2024 तक राजस्थान और उत्तर प्रदेश में पशु चिकित्सक के रूप में सरकारी सेवा दी। किंतु आरोप है कि इस पूरे कार्यकाल के दौरान उसने दोनों राज्य सरकारों से यह तथ्य छिपाए रखा कि, वह एक पार्टनरशिप फर्म में साझेदार भी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि यह सबकुछ नियमसम्मत ही था, तो फिर इस तथ्य को वर्षों तक सरकारी अभिलेखों से दूर रखने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी?
सरकारी सेवा नियमावली के अनुसार, बिना सरकारी अनुमति के किसी व्यावसायिक फर्म में प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः भागीदारी जैसे कृत्य सेवा नियमों के घोर प्रतिकूल माने जाते हैं। ऐसे में डॉक्टर का फर्म में भागीदारी स्वीकार करना स्वयं ही कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
बताया गया कि, राजस्व न्यायालय में फर्म से संबंधित एक वाद की जिरह के दौरान जब उससे इस विषय में प्रश्न किया गया, तो उसने कथित रूप से यह दलील दी कि, “फर्म में कोई वाणिज्यिक गतिविधि नहीं हो रही थी, फर्म बीमार थी, इसलिए उसकी अचल संपत्तियों में बराबर का भागीदार होना सेवा नियमावली के प्रतिकूल नहीं है।” हालाँकि, जिस फर्म की स्थापना ही कारोबार करने के लिए उत्तर प्रदेश वित्तीय निगम (यूपीएफसी) से ऋण लेकर की गई हो, और जिसकी ऋण वसूली की प्रक्रिया वर्ष 2003 तक चलती रही हो, उसे गैर-वाणिज्यिक गतिविधि वाली फर्म बताना, गलत तथ्य को सही साबित करने के लिए हाथ पैर मारने जैसा लगता है।
स्थानीय स्तर पर भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि फर्म वास्तव में वाणिज्यिक गतिविधि नहीं कर रही थी। “बीमार” और निष्क्रिय थी, तो उसकी संपत्तियों में बराबरी का दावा इतनी मजबूती से आखिर क्यों किया जा रहा है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि, यह फर्म से रिटायर था, और अब दुबारा उसकी मूल्यवान हो चुकी संपत्ति हड़पने के लिए ही सारी जद्दोजेहद कर रहा है ?
विधिक जानकारों के अनुसार, सरकारी सेवा में रहते हुए किसी ऐसी फर्म में साझेदार होना, जो राज्य सरकार के उपक्रम उत्तर प्रदेश वित्तीय निगम की कर्जदार रही हो, प्रथम दृष्टया “उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956” के नियम 3, 15 और 16 का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है। इतना ही नहीं, इसे निष्पक्ष लोकसेवा की भावना के विपरीत वित्तीय कदाचार की श्रेणी में भी देखा जा सकता है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि, राजस्व और दीवानी न्यायालय में दिए गए उसके हस्ताक्षरित बयान और जिरह से जुड़े अभिलेख और अन्य दस्तावेज़ उसके पास सुरक्षित हैं, जो इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकते हैं। उसके अनुसार, अब केवल जुलाई माह में हाईकोर्ट खुलने का इंतजार है, जिसके बाद यह मामला विधिक रूप से निर्णायक मोड़ पर पहुँच सकता है।
फिलहाल हर्रैया क्षेत्र में इस पूरे प्रकरण को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। और लोग यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि सरकारी सेवा के दौरान नियमों को हल्के में लेने वाले लोग अक्सर सेवानिवृत्ति के बाद खुद को कानून से ऊपर समझ बैठते हैं। लेकिन अदालतों में दलीलों से ज्यादा महत्व अभिलेखों और तथ्यों का ही होता है।

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