विश्व नदी दिवस (28सितंबर) हार्दिक शुभकामनाएं।
![]() |
सीडब्लूसी अध्यक्ष प्रेरक मिश्र। |
नदियाँ केवल जलधारा नहीं हैं, बल्कि जीवन की धारा हैं।
भारत ही नहीं, तो संपूर्ण विश्व में सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है।
*मिस्र* की सभ्यता नील नदी के किनारे फली-फूली।
*मेसोपोटामिया* की सभ्यता टाइग्रिस और यूफ्रेटिस नदी पर आधारित रही।
भारत की सिंधु और गंगा घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में गिनी जाती है।
गंगा, यमुना, सिन्थु, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी आदि – हमारी संस्कृति में “माँ” के रूप में पूजित हैं।
हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी जैसे तीर्थस्थल नदियों के कारण ही आध्यात्मिक केंद्र बने।
कबीर, तुलसी, सूरदास, और रविदास जैसे संतों की साधना भी नदियों के तट पर हुई।
हमारे पर्व – माघ मेला, छठ पर्व, – सब नदियों से जुड़े हैं।
नदी केवल जल नहीं देती, बल्कि पूरे समुदाय को जीवन देती है।
कृषि: नदियों का जल किसानों की जीवनरेखा है।
मछली पालन: लाखों लोग आजीविका के लिए नदी पर निर्भर हैं।
परिवहन: प्राचीन समय में नदियाँ व्यापार और परिवहन का मुख्य साधन थीं।
संस्कृति: अनेक साहित्य,लोकगीत, नृत्य और त्यौहार नदियों के आधार पर बने।
आज नदियाँ गंभीर संकट से जूझ रही हैं।
प्रदूषण: गंगा, यमुना, गोमती जैसी नदियाँ औद्योगिक कचरे और प्लास्टिक से पीड़ित।
सूखना: कई नदियाँ गर्मियों में सूख जाती हैं – केन, बेतवा, दामोदर।
अवैध खनन: रेत खनन से नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन: हिमालयी ग्लेशियर पिघलने से गंगा-ब्रह्मपुत्र पर खतरा।
UNESCO के अनुसार दुनिया की 80% से अधिक अपशिष्ट जल बिना शोधन के नदियों में डाला जाता है।
वैश्विक पहल और भारत की योजनाएँ
2005 में कनाडा से विश्व नदियाँ दिवस की शुरुआत हुई।
आज 100 से अधिक देशों में इसे मनाया जाता है।
भारत में “नमामि गंगे परियोजना” – 2014 से गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए कार्यरत है ।
हम यह ध्यान रखें कि *नदी केवल राष्ट्रीय धरोहर नहीं, बल्कि समुदाय की आत्मा है*।
गाँव की पगडंडी, खेत की मेड़, शहर का पार्क – सबकी जीवनरेखा नदी है।
हमें यह देखना होगा कि हमारी स्थानीय नदियों का हाल कैसा है – साफ हैं या प्रदूषित?
क्या हमारा समुदाय नदी के साथ जुड़ा हुआ है या उससे दूर होता जा रहा है?
*हम क्या कर सकते हैं*।
नदी किनारे सफाई अभियान चलाएँ।
प्लास्टिक मुक्त नदी तट अभियान को बढ़ावा दें।
सामुदायिक स्तर पर वृक्षारोपण।
वर्षा जल संचयन से भूजल को पुनः भरें।
नदी से जुड़े उत्सव मनाएँ ताकि समाज को जुड़ाव महसूस हो।
“नदियाँ धरती की धड़कन हैं।”
“यदि नदियाँ जीवित हैं तो समुदाय जीवित है।”
नदियाँ हमें जीवन देती हैं, हमें भी उन्हें जीवन देना होगा।
समुदाय और नदी का रिश्ता आत्मा और शरीर जैसा है।
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें –
“*हम नदियों को बचाएँगे, उनकी स्वच्छता, संरक्षण और सम्मान करेंग*।”
तभी विश्व नदियाँ दिवस मनाना सार्थक होगा।
पूजनीय रामाशीष जी
वरिष्ठ प्रचारक रा स्व संघ
अखिल भारतीय संगठन महामंत्री *गंगा समग्र *

.jpg)