उच्च शिक्षा के नाम पर होता जालसाजी और व्यवसायीकरण का धंधा।

Sudhanshu Mishra
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DELHI : उच्च शिक्षा के नाम पर होता जालसाजी और व्यवसायीकरण का धंधा।

                        प्रतिमा पाठक

                            (दिल्ली)



शिक्षा किसी भी देश के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास की नींव होती है। विशेषकर उच्च शिक्षा, व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्रीय प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परंतु दुखद है कि आज उच्च शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में भी जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे काले साये मंडराने लगे हैं। शिक्षा का व्यवसायीकरण, डिग्री की होड़ और बेरोजगारी के दबाव ने एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया है जिसमें युवा अक्सर ठगों और फर्जी संस्थानों के शिकार हो जाते हैं।


आज देश में कई ऐसे तथाकथित 'विश्वविद्यालय' और 'कॉलेज' खुले हैं, जो बिना किसी मान्यता या वैधानिक अधिकार के छात्रों को डिग्रियाँ बाँट रहे हैं। ये संस्थान आकर्षक विज्ञापनों, प्लेसमेंट गारंटी और कम फीस जैसे प्रलोभनों से छात्रों को लुभाते हैं। अधिकतर मामलों में ये संस्थान यूजीसी   और एआईसीटीई  या किसी मान्य नियामक संस्था से मान्यता प्राप्त नहीं होते। छात्र जब तक सच्चाई जान पाते हैं, तब तक उनका समय, धन और भविष्य दोनों ही खतरे में पड़ जाते है।


डिजिटल युग में ऑनलाइन डिग्रियों और कोर्सेज का चलन तेजी से बढ़ा है। इस अवसर का लाभ उठाकर कई फर्जी प्लेटफॉर्म्स सामने आ चुके हैं जो नामी विदेशी विश्वविद्यालयों के नाम का दुरुपयोग कर फर्जी सर्टिफिकेट्स जारी कर रहे हैं। छात्र जब इन्हें किसी नौकरी या उच्च शिक्षा के लिए प्रस्तुत करते हैं, तब असली-नकली का फर्क सामने आता है और करियर पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।


शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय कई एजेंट और बिचौलिए छात्रों को विदेश में पढ़ाई, स्कॉलरशिप या सरकारी मान्यता प्राप्त कोर्सेज का सपना दिखा कर भारी रकम वसूलते हैं। कई बार वे नकली दस्तावेज, फर्जी एडमिशन लेटर या गलत जानकारी देकर छात्र और अभिभावक दोनों को भ्रमित करते हैं। यह भी देखा गया है कि कुछ छात्र जानबूझकर 'कम मेहनत में डिग्री' के चक्कर में इनका सहारा लेते हैं।


उच्च शिक्षा के नाम पर हो रही इस जालसाजी का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभाशाली, मेहनती विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। एक फर्जी डिग्री वाला व्यक्ति योग्य उम्मीदवार का स्थान ले सकता है, जिससे योग्यता का ह्रास और नैतिक पतन होता है। इसके अलावा जब बड़ी संख्या में छात्र ठगे जाते हैं, तो उनका आत्मविश्वास टूटता है, परिवार आर्थिक संकट में आता है और समाज में कुंठा और असंतोष की भावना फैलती है।


राष्ट्र के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि शिक्षा से ही कुशल मानव संसाधन तैयार होते हैं, जो देश के निर्माण में योगदान देते हैं। यदि शिक्षा का आधार ही छलावा और धोखा हो जाए, तो आगे की पीढ़ियाँ कैसे सशक्त बनेंगी?


*समाधान की दिशा में कदम*


केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ऐसे फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। समय-समय पर सूची प्रकाशित कर जनता को सूचित करना  भी आवश्यक है।


 छात्रों और अभिभावकों को यह बताया जाना चाहिए कि किसी भी संस्थान में प्रवेश से पहले उसकी मान्यता की जांच करें।

 नियामक संस्थाएं ऐसी वेबसाइट्स और मोबाइल ऐप्स विकसित करें, जहाँ छात्र संस्थानों की वैधता स्वयं जाँच सकें।

 समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चाहिए कि ऐसे मामलों को उजागर करें और जनचेतना फैलाएँ।

 

          उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक और संस्कार अर्जित करना होता है। यदि यह क्षेत्र ही ठगी और छल-कपट का अड्डा बन जाए तो यह समूचे समाज और राष्ट्र के लिए खतरे की घंटी है। इसलिए आज ज़रूरत है सजग और सतर्क रहने की, ताकि हमारे युवा शिक्षा के नाम पर किसी धोखे का शिकार न बनें और देश का भविष्य सुरक्षित रह सके।

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