मूक-बधिर मासूम के मामले में जे.जे. एक्ट की अनदेखी? सीडब्ल्यूसी में पेश किए बिना ही परिजनों को सौंपने पर उठे सवाल

Sudhanshu Mishra
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बस्ती। मालवीय तिराहे पर लावारिस हालत में मिली मूक-बधिर मासूम बालिका के मामले में कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि बाल संरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों को दरकिनार करते हुए पुलिस ने बालिका को बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष प्रस्तुत किए बिना ही परिजनों को सौंप दिया।

बताया जाता है कि करीब 4-5 वर्षीय बालिका देर रात अकेली मिली थी। वह न बोल सकती थी और न ही सुन सकती थी, जिससे उसकी पहचान और स्थिति का सत्यापन एक संवेदनशील विषय था। पुलिस ने प्रारंभिक तौर पर बालिका को सुरक्षित रखने की बात कही, लेकिन बाद की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि जुवेनाइल जस्टिस (जे.जे.) एक्ट के तहत किसी भी ऐसे बच्चे, जो संरक्षण और देखरेख की श्रेणी में आता हो, उसे बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है। समिति बच्चे की परिस्थितियों, सुरक्षा और वास्तविक अभिभावकों की पुष्टि के बाद आगे का निर्णय लेती है।

आरोप यह भी है कि बालिका का न तो मेडिकल परीक्षण कराया गया और न ही किसी विशेषज्ञ द्वारा काउंसलिंग कराई गई। जबकि ऐसे मामलों में यह प्रक्रिया बच्चे की सुरक्षा और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

स्थानीय लोगों में चर्चा है कि यदि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया तो यह बाल अधिकारों और संरक्षण से जुड़े नियमों की गंभीर अनदेखी मानी जा सकती है। लोगों का सवाल है कि क्या इतनी संवेदनशील स्थिति में पुलिस ने सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कीं या फिर नियमों को दरकिनार कर जल्दबाजी में फैसला लिया गया।

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