यूजीसी के नए जातिगत धार्मिक भेदभाव नियम संविधान पर सीधा प्रहार

Sudhanshu Mishra
0

 



यदि खुलेआम,कैमरे के सामने

ब्राह्मण,ठाकुर,बनिया,लाला को जूतों से मारने जैसे आपत्तिजनक और घृणास्पद नारे लगाए जाएँ उनके वीडियो ऑडियो और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद हों तो भी इस तथाकथित “भेदभाव विरोधी” व्यवस्था के अंतर्गत कोई स्वतः संज्ञान नहीं लिया जाएगा।

लेकिन यदि सामान्य वर्ग के किसी छात्र पर कोई छात्र किसी पर जातिगत या धार्मिक भेदभाव का झूठा आरोप भी लगा दे तो मात्र आरोप के आधार पर ही छात्र को जाँच, निलंबन,सामाजिक अपमान और मानसिक प्रताड़ना की प्रक्रिया में झोंक दिया जाएगा।

यही न्याय है?क्या यही संविधान है?


अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है।

लेकिन यहाँ समानता नहीं, चयनित दंड व्यवस्था बनाई जा रही है।

अनुच्छेद 15(1) जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव से रोकता है,

लेकिन यह नियम एकतरफा संरक्षण और एकतरफा अपराधीकरण को वैध बना रहा है।

अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है,पर यहाँ वह स्वतंत्रता केवल कुछ वर्गों के लिए है बाक़ियों के लिए वह अपराध बन जाता है।

अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा का अधिकार देता है,पर झूठे आरोपों के नाम पर छात्रों की गरिमा,मानसिक शांति और भविष्य को रौंदा जा रहा है।

यह व्यवस्था न्याय की नहीं, भय की संस्कृति वातावरण पैदा कर रही है।

जैसे एससी-एसटी ऐक्ट का दुरुपयोग वर्षों से सामने आता रहा है,उसी मॉडल को अब विश्वविद्यालयों में संस्थागत रूप दिया जा रहा है जहाँ आरोप ही दंड बन जाता है।

और भ्रम में मत रहिए —

यह केवल सवर्णों तक सीमित नहीं रहेगा।

पिछड़ा समाज भी इसके दायरे में आएगा और तब एहसास होगा कि यह लड़ाई किसी जाति की नहीं,संवैधानिक संतुलन और प्राकृतिक न्याय की है।जो व्यवस्था

जाँच से पहले सज़ा दे,सबूत से पहले बदनामी करे,और अधिकार से पहले डर पैदा करे वह लोकतंत्र नहीं,वैचारिक तानाशाही होती है।

अगर आज इस पर चुप्पी है,तो कल शिक्षा नहीं,

संविधान खुद कटघरे में खड़ा होगा।

 संविधान निर्माताओं ने कहा था सबको समानता का अधिकार होना चाहिए यही संविधान में लिखा है।

Post a Comment

0 Comments

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*

To Top