मनोरमा नदी व मखौड़ा धाम की दुर्दशा पर जनआक्रोश, जनहित में संघर्ष जारी रहेगा – चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामा’

Sudhanshu Mishra
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हर्रैया/बस्ती।

काशी, अयोध्या और तीर्थों के कायाकल्प की चर्चा के बीच हर्रैया क्षेत्र की पौराणिक धरोहर मखौड़ा धाम और उससे जुड़ी पतित-पावनी मनोरमा नदी आज भी बदहाली का शिकार है। यह वही मनोरमा नदी है, जिसके तट पर अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था और जिसके प्रभाव से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का बालक रूप में प्राकट्य हुआ। इतनी महान पौराणिक व सांस्कृतिक विरासत के बावजूद मनोरमा नदी आज कचरा, गंदगी, अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता का दंश झेल रही है।

वरिष्ठ भाजपा नेता व समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामा’ ने बताया कि मनोरमा नदी की सफाई और संरक्षण के लिए उन्होंने वर्ष 2015 से लगातार पत्राचार, ज्ञापन और जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। प्रयासों के क्रम में वर्ष 2018 में मखौड़ा धाम स्थित यज्ञ स्थल पर एक सप्ताह का आमरण अनशन भी किया गया। उस समय तत्कालीन उपजिलाधिकारी श्री शिवप्रकाश शुक्ल द्वारा आश्वासन देकर धरना समाप्त कराया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा संज्ञान लिये जाने के उपरान्त तत्कालीन जिलाधिकारी श्री राजशेखर एवं श्रीमती प्रियंका निरंजन द्वारा सफाई अभियान का शुभारम्भ भी किया गया, किंतु यह अभियान केवल शुरुआत तक सीमित रह गया और स्थायी समाधान नहीं हो सका।

श्री पाण्डेय ने बताया कि मनोरमा नदी में कचरा निस्तारण पर रोक, अतिक्रमण हटाने और नदी को अविरल-निर्मल बनाये रखने के लिए उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज में जनहित याचिका भी दाखिल की। दुर्भाग्यवश, पर्याप्त प्रमाण न माने जाने के आधार पर याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने इसे “लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत – जनता” के समक्ष रखने का निर्णय लिया और जनजागरण अभियान शुरू किया, जिससे लगातार लोग जुड़ते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग यह सुझाव देते हैं कि समस्या उठाने के बजाय स्वयं सफाई अभियान चलाया जाए। हम इससे इनकार नहीं करते, किंतु सवाल यह है कि यदि नदी, नाले, चौराहे और घाट सब कुछ जनता ही साफ करेगी तो सफाईकर्मी, मनरेगा कर्मी, अधिकारी और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी क्या केवल औपचारिकता और दिखावा रह गई है? यदि जनता को ही सब करना है तो समय-समय पर मनोरमा सफाई के नाम पर हुए सरकारी और राजनीतिक दिखावे का औचित्य क्या था?

श्री पाण्डेय ने प्रश्न उठाया कि नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत केंद्र व प्रदेश सरकार द्वारा नदियों की सफाई हेतु हजारों करोड़ रुपये निर्गत किये गये, जिनमें पौराणिक महत्व वाली नदियों को प्राथमिकता दी गई। फिर मनोरमा नदी तक उस योजना का लाभ क्यों नहीं पहुँचा? क्या जिले के स्तर पर इच्छाशक्ति और पारदर्शी योजना बनाकर इस पवित्र नदी की दशा नहीं सुधारी जा सकती?

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति या सरकार के विरोध का नहीं, बल्कि पौराणिक धरोहर, आस्था और पर्यावरण संरक्षण का है। यदि जिलाधिकारी और जनप्रतिनिधि ठान लें तो स्थानीय संसाधनों, मनरेगा, नगर पंचायत व अन्य विभागों के समन्वय से स्थायी सफाई और संरक्षण संभव है।

अंत में श्री पाण्डेय ने कहा कि वे और उनके साथी मनोरमा एवं रामरेखा नदी की सफाई हेतु जनजागरूकता अभियान को और तेज करेंगे। जनता से अपील है कि न तो स्वयं नदियों में कूड़ा डालें और न किसी को डालने दें, साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही तय कराने के लिए अपनी आवाज बुलंद करें।

मनोरमा की अविरल-निर्मल धारा ही मखौड़ा धाम और क्षेत्र के सम्मान की सच्ची पहचान है।

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