BASTI : भ्रष्टाचार प्रशिक्षण केंद्र बन गई है तहसील "हरैया" !

Sudhanshu Mishra
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- “जहाँ न्याय नहीं, चलता है रेट कार्ड ।”


     अशोक मिश्र 

बस्ती। जिले की बदनाम तहसील हरैया एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह वही पुरानी, लेकिन हालात और भी बदतर हो चले हैं। यहाँ प्राइवेट मुंशी अब ‘मेहमान’ नहीं रहे, बल्कि स्थायी शासक बन बैठे हैं। इनकी संख्या अब असली सरकारी कर्मचारियों से कहीं ज्यादा हो चुकी है। कई उपजिलाधिकारियों ने इन तथाकथित मुंशियों को बार-बार बाहर फेंकने की कोशिश की, मगर जैसे ही इन अधिकारियों का तबादला होता है, नया अधिकारी जब तक कुछ समझे, ये मुंशी फिर से वापस उसी शान से अपनी कुर्सियों पर विराजमान हो जाते हैं। अब सवाल ये है कि, आखिर किसके इशारे पर? और इससे भी बड़ा सवाल यह कि, इनकी मौजूदगी यहां आखिर इतनी ‘जरूरी’ क्यों है? 



                       कहा जाता है, ‘हरैया’ प्रदेश की सबसे बड़ी तहसील है। इतनी बड़ी कि कई जिले इसके आगे बौने लगते हैं। भीड़, फाइलें, मुकदमे और अफरातफरी सब कुछ ‘बड़ी मात्रा’ में है। अब जहाँ भीड़ होगी, वहाँ कमाई के मौके भी बड़े होंगे। और हरैया इसका जिंदा उदाहरण है। अब इसमें मंशियों की भूमिका यहाँ यह दिखती है कि, इन्होंने हर फाइल, हर पत्रावली और हर दस्तावेज पर ‘कीमत’ लिख रखी होती है। बस नंबर वही पढ़ सकता है जो ‘भुगतान’ करने को तैयार हो।


                  अब इनकी महत्ता की बात करें तो ये प्राइवेट मुंशी घूसखोरों का ‘सुरक्षा कवच’ हैं। क्योंकि कानूनी रूप से ये सरकारी नहीं हैं। और यही इनकी सबसे बड़ी ताकत भी है। 

                

                         कोई भी घूसखोर अधिकारी या कर्मचारी अपने पालतू मुंशी के जरिये ही घूस लेना पसन्द करता है। क्योंकि ये एण्टी करप्शन आर्गनाइजेशन की पकड़ से पूरी तरह बाहर होते हैं। ऐसे में फाइलें इधर से उधर, और रुपये उधर से इधर। सबकुछ इतने ‘व्यवस्थित ढंग’ से हो जाता है कि एंटी-करप्शन इनका बाल भी बाँका नहीं कर पाता।


               तहसील में इनके सम्मान की स्थिति यह है कि, तहसील परिसर में घूमते हुए आप पहचान ही नहीं पाएँगे कि कौन स्थायी कर्मचारी है और कौन ये ‘ठेकेदार मुंशी’। आफिस वही, कुर्सी वही, फाइल वही, काम वही। बस अंतर इतना कि, ये बिना डर-खौफ के हर गलत काम के ‘ठेकेदार’ बने बैठे रहते हैं। इनके इशारे पर फाइलें उड़ जाती हैं, केस रुक जाते हैं, और जनता की साँसें अटक जाती हैं। घूस देने वाले को ये दुआओं की तरह सम्मान देते हैं, और न देने वाले को सजा के रूप मे परेशान करते हैं। उसका काम तो ये किसी भी हालत में नहीं होने देते।


                   कुल मिलाकर जो लोग यहां घूस देकर काम कराने के आदी हैं, उनके लिये तो ये मुंशी किसी वरदान की तरह बन जाते हैं। लेकिन जिनके पास देने को पैसा नहीं होता, उनके लिए ये मुंशी इस तहसील को एक यातना-शाला बना देते हैं। उनकी पत्रावलियाँ गायब कर दी जाती हैं, और फिर कहा जाता है कि, 'ढूंढने का खर्चा लगेगा।' जिसे काम जल्दी चाहिए, वो मजबूरी में इसे ‘ढूंढने का खर्चा’ चुका देता है। लेकिन जिसके पास पैसा नहीं है, वो लाचार इधर उधर घूम घूम कर रोने से ज्यादा कुछ भी नहीं कर पाता। दरअसल यही इनका असली व्यवसाय है। फाइलें छिपाओ, फिर उसे बेचकर प्रकट करो!

                     हद तो ये है कि कई न्यायालयों में इन्हें अहलमद की कुर्सी तक बिठा दिया गया है। वहीं से ये मुकदमों की दिशा और किस्मत दोनों तय करते रहते हैं। रकम अगर सही पहुंच गई, तो फैसला भी ‘सही दिशा’ में चला जाता है। वर्ना की बात ही अलग है। इनके मुताबिक हरैया में न्याय नहीं, ‘रेट कार्ड’ चलता है।


                  अभी कुछ दिन पहले नायब सदर के कार्यालय से एक विधवा महिला की दाखिल-खारिज की पत्रावली गायब हो गई। हफ्ते भर ‘खोज अभियान’ चला, लेकिन फाइल मिली नहीं। महिला ने खोज-खर्च देने से इंकार किया, तो मामला प्रेस तक पहुँच गया। और जैसे ही खबर छपने की आहट हुई, गायब फाइल अचानक प्रकट हो गई!

    

                    'अब इसे चमत्कार कहें या हरैया की ‘प्रशासनिक पारदर्शिता’?

                 

                       कुल मिलाकर, जब तक इन प्राइवेट मुंशियों को तहसील परिसर से बाहर नहीं निकाला जाता, ना घूसखोरी रुकेगी, ना जनता का शोषण। और तब तक हरैया में न्याय नहीं, मुंशीराज ही चलता रहेगा। 

     

                      ऐसा भी नहीं हैं कि, आज से पहले इनपर कोई कार्रवाई ही नहीं हुई है। पूर्व एसडीएम अमृतपाल कौर, गुलाब चन्द्र और सुखवीर सिंह आदि कई अधिकारियों नें अपने कार्यकाल में इन्हें धक्के मरवाकर तहसील परिसर से बाहर कराया है। लेकिन इस बार इनका जादू कुछ ज्यादा ही असर कर गया लगता है। जिसके चलते इन्हें निकालने के बारे में मानो कोई सोचना भी नहीं चाह रहा है।


                ऐसे माहौल में हरैया तहसील अब किसी आम तहसील की तरह नहीं रह गई है। बल्कि यह एक भ्रष्टाचार का प्रशिक्षण केंद्र बन चुकी है। जहाँ से हर नया अफसर ‘कमीशन व्यवस्था’ का संस्कार लेकर जा रहा है।

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