BASTI : तहसील हरैया में संगठित भ्रष्टाचार ? राजस्व अधिकारियों ने दीवानी आदेश को बना दिया तमाशा !

Sudhanshu Mishra
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तहसील हरैया में संगठित भ्रष्टाचार ? राजस्व अधिकारियों ने दीवानी आदेश को बना दिया तमाशा !  

अशोक मिश्र ।

बस्ती। राजस्व विभाग के अधिकारी अब दीवानी न्यायालय के आदेश का भी ट्रायल करने लगे हैं। जबकि विद्वान अधिवक्ता बता रहे हैं कि ऐसा करने का कोई अधिकार एसडीएम या तहसीलदार को नहीं है। जब मुंसिफ न्यायालय का आदेश अंतिम और स्पष्ट है, तो ऐसे में उप जिलाधिकारी न्यायिक के न्यायालय में उसके अनुपालन की जगह ट्रायल जैसी नौटंकी आख़िर क्यों की जा रही है ? जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत मिलने के बावजूद हल्का लेखपाल को भ्रामक रिपोर्ट लगाने की हरी झंडी आखिर किसने दी ? क्या यह पूरा प्रकरण तहसील स्तर पर बैठे एक संगठित भ्रष्टाचार गैंग की करतूत तो नहीं, जो बखरा के आगे न्यायिक आदेशों को भी नहीं मानता? न्याय की जमीन पर सवाल खड़ा करने वाली यह तस्वीर तहसील हरैया की है।


मामला भी यहीं के निवासी पत्रकार श्रीश द्विवेदी की रजिस्टर्ड फर्म की भू-संपत्ति के नामांतरण से जुड़ा हुआ है। जिसमे फर्म के सेवानिवृत्त भागीदारों द्वारा गैर कानूनी ढंग से इसकी भू संपत्ति का हस्तांतरण करा लिया गया। यह सब तब किया गया जबकि इस संपत्ति को लेकर विवाद वर्ष 2016 से ही उप जिलाधिकारी (न्यायिक) के न्यायालय में विचाराधीन है। जिसे लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

‎          विभिन्न स्तर पर की गई शिकायतों में श्रीश ने बताया है कि, गाटा संख्या - 204, ग्राम - राजघाट,तहसील हरैया, बस्ती, एक रजिस्टर्ड पार्टनरशिप फर्म, "मेसर्स श्री राधा हस्तकर्घा उद्योग" की सम्पत्ति है। जिसका सृजन वा क्रियान्वयन इन्डियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 के तहत पार्टनरशिप डीड के अनुरूप होता रहा है।        

‎              फर्म "मेसर्स श्री राधा हस्तकर्घा उद्योग" के कुल चार भागीदारों माया द्विवेदी, प्रवीश चंद्र, रवीश चन्द्र वा श्रीश के मध्य फर्म के कर्ज की अदायगी तथा एक दूसरे की कार्यशैली को लेकर विवाद हुआ। जिसके बाद दो भागीदार माया द्विवेदी वा प्रवीश चन्द्र पार्टनरशिप डीड की धारा 9 के तहत 15- 01- 1992 को स्वेच्छा से रिटायर होते हुए फर्म की समस्त लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो गए। साक्ष्य रूप में इस आशय का एक लेख पत्र भी लिखा गया जिसमें सभी भागीदारों ने हस्ताक्षर भी किए हैं। 

‎                      शेष बचे दो भागीदारों रवीश चन्द्र वा श्रीश में से रवीश चन्द्र ने विवाद को लेकर न्यायालय मुंसिफ बस्ती के न्यायालय में एक वाद संख्या- 105/92 रवीश चन्द्र बनाम श्रीश चन्द्र आदि दाखिल किया। जहां आगे चलकर वे भी सुलहनामे के माध्यम से उक्त फर्म से रिटायर होते हुए समस्त लायबिलिटी वा एसेट से मुक्त हो गए। न्यायालय ने इस सुलहनामे को डिग्री का अंश किया। तथा इस घटना के साथ ही फर्म उक्त विघटित हो गई। और न्यायालय के इस आदेश के बाद से आज तक फर्म की समस्त जिम्मेदारी और सम्पत्ति श्रीश के जिम्मे तनहा चली आ रही है। 

‎                      लेकिन राजस्व अभिलेखों में रिटायर भागीदार भी बतौर सह खातेदार दर्ज चले आ रहे हैं। ऐसे में इनका नाम उक्त रकबे से हटाए जाने के लिए श्रीश की ओर से न्यायालय मुंसिफ बस्ती की उल्लिखित डिग्री के आधार पर उप जिलाधिकारी हरैया के न्यायालय में एक वाद श्रीश चन्द्र बनाम माया द्विवेदी आदि संख्या - टी20161714013446 दाखिल किया गया। जो 2016 से ही विचाराधीन है। जबकि कानून के जानकारों के मुताबिक इस मुकदमे में मुंसिफ के आदेश के अनुपालन के अलावा राजस्व न्यायालय के पास दूसरा विकल्प ही नहीं है। बावजूद इसके यहां इस आदेश का ही ट्रायल चल रहा है। और इसपर बकायदा गवाही, बयान और जिरह भी कराई जा रही है। या यूं कहें कि, राजस्व न्यायालय में ही बाकायदा दीवानी चलाई जा रही है।

‎                    खैर ! ऐसा नहीं है कि इस न्यायालय के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर वर्षों से मुकदमे को जेरे कार्रवाई रखने का किसी ने फायदा नहीं उठाया। बल्कि विपक्षियों ने अधिकारियों की मिलीभगत से इसका फायदा विचाराधीन भूमि की जालसाजी करके उठाया !


                     दरअसल, इस वाद मे रिटायर भागीदार भी पक्षकार बनाए गए हैं। जिसमे से दो पक्षकारों माया द्विवेदी वा प्रवीश चन्द्र ने मुंसिफ बस्ती के उक्त आदेश वा डीड के अनुरूप अपने रिटायरमेंट को दरकिनार करते हुए, विचाराधीन मुकदमे के दौरान, खतौनी मे दर्ज अपने नाम का दुरुपयोग करते हुए रजिस्टर्ड दान पत्र के माध्यम से फर्म की जमीन को आपस में हस्तांतरित कर इसकी एक पक्षीय दाखिल खारिज भी करा ली। और उसे बेचने के लिए ग्राहक की तलाश भी शुरू कर दी। जिसका अधिकार उन्हें कतई नहीं था। हां, अधिकारियों का भरपूर सहयोग जरूर था।

‎                                    इतना ही नहीं, प्रवीश चंद्र ने अपने इस कारनामे के बाद तथ्यों को छिपाकर फर्म की भूमि की नवइयत विकृत कर उसे हड़पने की नियत से खारिज दाखिल के बाद न्यायालय उप जिलाधिकारी हरैया में बंटवारे का एक वाद भी प्रवीश चन्द्र बनाम श्रीश चन्द्र आदि दाखिल कर दिया है। जबकि कानून के जानकारों ने नगर पंचायत की सघन आबादी में स्थित फर्म और आवासीय भूमि का बंटवारा राजस्व न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः बाहर बताया है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि, एक ओर जिस जमीन के नामांतरण का मुकद्दमा एसडीएम न्यायिक की अदालत में चलाया जा रहा है। वहीं ठीक इसी समय इसी जमीन के बंटवारे का मुकद्दमा भी एसडीएम प्रशासनिक की अदालत में चलाया जा रहा था। जिसमे 01/09/25 को प्रवीश के पक्ष में एक पक्षीय आदेश भी हो गया है। अब देखने की चीज यह होगी कि, नगर पंचायत की सघन आबादी में स्थित इस दीवानी आदेश शुदा, एसडीएम न्यायिक की अदालत में विचाराधीन आवासीय और फर्म की अकृषिक भूमि का कोर्रा लेखपाल कैसे बनाएगा? और आगे की फर्जी कार्रवाई कैसे होगी ?

‎                              श्रीश ने बताया कि इस जालसाजी की जानकारी होने पर तहसीलदार हरैया के न्यायालय में खारिज दाखिल के एक पक्षीय आदेश की मनसूखी के लिए जालसाजी का हवाला वा सबूत देते हुए कायमी दाखिल किया और विचारण तक इस आदेश पर स्टे की याचना की गई। लेकिन यहां स्टे के लिए बखरे की मांग की गई। जिसे ना दे पाने की स्थिति में उन्हें यहां भी कोई राहत नहीं मिली। 

‎                                उन्होंने आगे बताया कि, इस सबकी सूचना 31 मार्च 23 को ही जिलाधिकारी बस्ती के आधिकारिक मेल आईडी पर दे दी थी। नियमानुसार यह कार्यवाही के लिए अग्रसारित भी हुआ रहा होगा। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी तारीख को यही सूचना जन सुनवाई पोर्टल पर भी दी गई जो तहसीलदार हरैया को अग्रसारित हुआ था। लेकिन समाधान या राहत के नाम पर तहसीलदार ने जानबूझ कर इसे हल्का लेखपाल के हवाले कर दिया। जिसने इशारा समझ कर अपनी भ्रामक रिपोर्ट लगा इसका भी अन्तिम संस्कार कर डाला। जिसका कारण भी सिर्फ और सिर्फ बखरा ही है। ‎


                            मामले में जनपद न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रकाश तिवारी ने कहा कि, " ऐसी स्थिति में जबकि, राजस्व न्यायालय में यह वाद मुंसिफ के आदेश के अनुपालन के लिए दाखिल किया गया है। और विपक्षियों ने ऐसा कोई भी दूसरा आदेश नहीं प्रस्तुत किया है जो वर्तमान आदेश से ऊपर हो, उप जिलाधिकारी को नामांतरण का आदेश जारी कर देना था। उनके पास पार्टनरशिप फर्म के रिटायरमेंट पर सुनवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा करना उनके अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः बाहर है।"


जबकि, एसडीएम न्यायिक ने कहा कि, "धारा 144 का मुकद्दमा दीवानी के तर्ज पर चलता ही है। फॉर्मेलिटी तो पूरी की ही जाएगी।"



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