उल्टा पड़ सकता है प्रवीश द्विवेदी का कानूनी दांव, हस्ताक्षर बनेंगे सबूत !

Sudhanshu Mishra
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  • पेंशन और अन्य सेवा लाभों पर खड़े हो सकते हैं सवाल। 


बस्ती। हर्रैया नगर पंचायत के हाई प्रोफाइल जालसाज का एक और चौंकाने वाला कारनामा सामने आया है। इस बार मामला सीधे न्यायालय से जुड़ा है, जहां प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी नाम का यह व्यक्ति अपने ही द्वारा वर्ष 2017 में दाखिल वादपत्र पर अब पूरे 9 साल बाद हस्ताक्षर करने की अनुमति मांग रहा है।


                    कानूनी जानकारों की मानें तो, यदि इसे हस्ताक्षर की अनुमति मिल जाती है, तो यह इसके लिए खुद के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बन सकता है। क्योंकि वादपत्र पर हस्ताक्षर करते ही यह स्वतः स्वीकार कर लेगा कि वर्ष 1992 से लेकर 2024 तक अपनी पूरी सरकारी सेवा के दौरान इसने "राजस्थान सिविल सेवाएं (आचरण) नियम, 1971" के नियम-18 तथा "उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956" के नियम 15 व 16 का गंभीर उल्लंघन किया है।


                    दरअसल, यह पूरा मामला एक ऐसे शातिर रिटायर्ड अधिकारी से जुड़ा है, जिसने 1992 में राजस्थान सरकार के अधीन पशु चिकित्सक के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। लेकिन नौकरी ज्वाइन करने के समय ही वह नियमों के जाल में फंस गया था। नियम-18 के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना सरकारी पूर्व अनुमति के किसी व्यापार, वाणिज्य या अन्य नौकरी में संलग्न नहीं हो सकता। जबकि उस समय यह हर्रैया स्थित एक पार्टनरशिप फर्म में भागीदार था।


                   फर्म के एकमात्र स्वामी श्रीश द्विवेदी के अनुसार, नियमों की बाध्यता को देखते हुए प्रवीश ने स्वयं फर्म से अलग होने की इच्छा जताई थी। अन्य भागीदारों ने इसे स्वीकार करते हुए विधिवत इसे फर्म से रिटायर कर दिया था। इस प्रक्रिया को विधिक रूप देने के लिए सभी भागीदारों के हस्ताक्षर से एक नोटरीकृत दस्तावेज भी तैयार किया गया, जिसकी प्रति लेकर यह राजस्थान चला गया और वहां विधिवत सरकारी सेवा में स्थापित हो गया। कुछ समय बाद अवसर मिलते ही यह उत्तर प्रदेश सरकार की सेवा में आ गया। और यहां भी उसी पद पर कार्यरत रहा।


                   लेकिन समय के साथ हर्रैया स्थित उसी फर्म की संपत्तियों का मूल्य बढ़ता गया और इसी के साथ प्रवीश का लालच भी। बताया जाता है कि, उत्तर प्रदेश में नौकरी के दौरान इसने कई बार फर्म में पुनः प्रवेश करने की कोशिश की। लेकिन हर बार इसकी सरकारी सेवा ही इसके रास्ते में बाधा बनती रही।

क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 15 व 16 के अनुसार कोई भी सरकारी सेवक बिना पूर्व सरकारी अनुमति व्यापार या व्यवसाय में संलग्न नहीं हो सकता।


                   स्थिति तब बदली जब वर्ष 2016 में फर्म के पूर्व भागीदार श्रीश द्विवेदी ने मुंसिफ बस्ती की वर्ष 1992 की डिग्री के आधार पर एसडीएम हर्रैया न्यायालय में दावा प्रस्तुत किया। इस दावे में कहा गया कि, उक्त डिग्री के अनुसार चार भागीदारों में से अन्य तीन रिटायर हो चुके हैं। और अब वे फर्म के एकमात्र स्वामी हैं। अतः राजस्व अभिलेखों से अन्य रिटायर भागीदारों के नाम हटाए जाएं।


                  यहीं से प्रवीश ने नया खेल शुरू किया। और इसने अन्य दो रिटायर भागीदारों को फर्म की संपत्ति वापस दिलाने का लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया। साथ ही स्वयं भी इस विवाद में कूद पड़ा। इसने न केवल एसडीएम न्यायालय में आपत्ति दाखिल की। बल्कि 2017 में ही मुंसिफ न्यायालय बस्ती में 1992 की डिग्री को निरस्त कराने के लिए वाद भी दाखिल कर दिया।


                    लेकिन यहां इसकी चालाकी साफ दिखती है। सरकारी सेवा में रहते हुए खुद को बचाने के लिए इसने वादपत्र पर अपने हस्ताक्षर नहीं किए और एक अन्य रिटायर भागीदार माया द्विवेदी को मुकदमे में शामिल कर उनके हस्ताक्षर से मुकदमा दाखिल कराया। अब, जब यह 2024 में सेवा से सेवानिवृत्त हो चुका है, तो इसने उसी पुराने वादपत्र पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए न्यायालय से अनुमति मांगी है।


                     कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि, यह कदम इसके मुकदमे को मजबूत करे या न करे, लेकिन इसके खिलाफ एक बड़ा प्रमाण जरूर बन सकता है। जो इसकी पेंशन और अन्य सेवा लाभों आदि पर भी सवाल खड़े कर सकता है।

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